Piali

Hi, my name is Piali, and I’m Indian, from India.

I identify as butch…lesbian, genderqueer.

I’ve been out for as long as I can remember, really, which at this point is a very long time.

I officially came out to my family, when I was about 18, but as with most things with my family I was about the last person to know, and they pretty much confronted me about my sexuality. Luckily, my experience, with coming out to my mom, in particular, was very pleasant and supportive. It was a process, nonetheless, but I think on the whole it was a very supportive process, and she basically told me that she loved me; she didn’t understand, but that she was willing to talk about it. That made me very happy, and it’s been years and years of wonderful conversation and support, since.

I would say that most of my extended family knows. I mean, look at the way I look; it’s acknowledged not as much as it is known. I mean everyone knows. I’m fairly open about my partner and I’m in the media. I’m in A film that’s out in the circuits right now so people are very aware of my sexuality. I think my gender identification tends to be more of a point—the elephant in the room, if you will—than my sexuality.

I definitely think that when I’m in India I stick out like a sore thumb. I don’t know, necessarily, if it’s as much about my sexuality…because you know sexuality is in the closet back home, in general, but I think more the fact that I look different and, I guess, just my energy is different. I have male energy in the public spectrum and I think that can be something that attracts attention, both positive and negative, I would say. And it’s been dealt with in a variety of different ways by people who don’t know me. And I think mostly I attract a lot of confusion and apology from people I have to interact with, in a daily sense, when they do not know how to behave. So it has more to do with me and them and being able to articulate or conform to some kind of vocabulary or language around the way I look and why I’m different. It’s hard to pinpoint in everyday language.

So yes, definitely. I speak Hindi and Bengali. My family is from the East and I grew up speaking Bengali, but I want to school in North India and was required to learn and live among people who speak Hindi, so I grew up fluent in both those languages. I would definitely agree that it is difficult to articulate in any polite conversation about sexual orientation or differences therein. But also because speaking about sexuality, whether it’s a hetero matter or in any way different from that is so taboo back home, in any case, that adds another layer of challenge to the situation. But I think it also depends on the context because when you’re speaking to your parents and aunts it’s polite and you sort of stumble even to talk about any type of sexuality. But definitely to explain to them that their assumptions are off-base is harder still, but I think when you’re speaking to friends or cousins it’s…

I think visibility is good. I think the more people get comfortable with you and me being one of them, the more they are able to feel comfortable finding language and vocabulary around communicating with you and me with what matters to us. Because I’m sure it matters to them, as well, since we are all part of the same community. And I think it’s gonna matter more if it’s more in the public spectrum, so I think that definitely the Asian Pride Project is a substantial report.
नमस्ते, मेरा नाम पियाली है, और मैं भारतीय हूँ, भारत से।

मैं अपने आप को बुच समझती हूँ, और समलैंगिक और जेंडर क्वियर भी।

जबसे मुझे याद है, तबसे उनको पता है। इस बात को तो अब बहुत देर हो गयी है।

वैसे जब मैने उनसे बात की तो मैं लग – भग 18 साल की थी, लेकिन मेरे परिवार में आम बात है कि मुझे सबके बाद ही असलियत का पता चलता है, तो उन्होंने ही आकर मुझसे मेरी लैंगिकता के बारे में बात की। यह मेरा सौभाग्य है कि ख़ास तौर से मां से मेरी बात मधुरता और सहायता से हो सकी। खुलके बात करने में, समझने में थोड़ा वक़्त तो लगती है, लेकिन फिर भी मुझे उनका सहारा मिला। उन्होंने मुझसे कहा कि वह मुझसे प्यार करती हैं, कि यह बात बेशक उनके समझ के बाहर है, लेकिन वह मुझसे बात करने के लिए राज़ी हैं। यह सुनकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई, और तब से आज तक, सालों साल, वह मेरा साथ देती आइ हैं।

मेरे परिवार में लग-भग सबको पता है। मुझे देखकर ही सब जान जाते हैं। अपने जीवन-साथी के बारे में मैं खुलकर बात करती हूँ और फिल्मों में काम करती हूँ तो सबको मेरी लैंगिकता के बारे में पता है। मेरे ख़याल में लोगों को मेरी लैंगिकता से ज़्यादा बड़ी बात मेरी अपनी लिंग पहचान लगती है।

मुझे यह ज़रूर लगता है की जब मैं भारत जाती हूँ, वहाँ सबसे अलग दिखती हूँ। मैं यह नहीं कह सकती कि यह मेरी लैंगिकता की वजह से है क्योंकि आपको पता है कि वहाँ लोग इस बारे में बात नहीं करते। लेकिन मेरा रंग-ढंग अलग है और मेरा स्वभाव अलग है। लोगों को मेरा मर्दाना स्वभाव दिखाई देता है; यह अच्छी बात भी है और बुरी भी। अक्सर लोग मुझे मिलकर उलझन में पड़ जाते हैं और फ़िर मुझसे माफी मांगनी पड़ती है। मुश्किल यह है कि हमारी भाषा में यह बातें करना, उन्हें समझाना कि मैं ऐसे क्यों दिखती हूँ, अलग क्यों हूँ, आसान नहीं है।

ज़रूर। मैं हिंदी और बंगाली बोलती हूँ। मेरा परिवार पूर्व भारत से है और बचपन से मैं बंगाली बोलती आई हूँ, लेकिन मैने अपनी पढ़ाई उत्तर में की, तो हिंदी बोलने वालों के साथ रहकर वह भी सीखली। यह सच है कि लैंगिकता और लैंगिकता में मतभेद के बारे में बात करना मुश्किल है। लेकिन यह भी देखना पड़ता है कि हम किससे बात कर रहे हैं। क्योंकि बुज़ुर्गों से ऐसी बात करने में तो वैसे ही ज़ुबान लड़खड़ाती है। फ़िर ऊपर से उनसे कहना कि जो वह हमारे बारे में सोच रहे हैं वह ग़लत है, यह और भी मुश्किल है। दोस्तों या भाई-बहनों से अलग तरह से बात कर सकते हैं।

लोगों को दिखाई देना, यह अच्छी बात है। मेरे ख़याल में जितना लोग महसूस करेंगे कि आप और मैं उनके जैसे ही हैं, उतनी जल्दी वह हमसे बात-चीत कर सकेंगे। एशियन प्राइड प्रौजेक्ट यह साबित करेगा कि जो बातें उनके लिए ख़ास हैं, वह हमारे लिए भी ख़ास हैं, क्योंकि आख़िर हम एक ही समाज के बंदे हैं।